शुक्रवार, सितंबर 05, 2008

जिंदगी अब भी जिन्दा है ...


पानी पानी रे..... जहाँ देखा वहां पानी ही पानी
खेत में पानी खालेहन में पानी
घर में , दालान में पानी ही पानी
लीला जब तक समझ में आती कोसी सब कुछ लील चुकी थी ।
कोसी के बाढ़ मे सब कुछ दह गया
कुछ बच गया तो वो थी उम्मीद.......
बाढ़ से घीरे उस ऊँचे मचान पर बैठे लोगों की उम्मीद भी जबाब दे चुकी है ।
आँखों के सामने आज भी वही मंजर वक़्त बे वक़्त दस्तक दे जाती है ।
सुख दुःख मे गांव साथ था ,पर मदद की स्थिति मे नही ।
बाढ़ की ख़बर सुन परिवार को बचने दिल्ली से चला
पहुँचते पहुँचते आठ दिन लग गए
घर तो दूर परिवार की एक झलक को तरस गया ।
किसको किस गुनाह की सजा मिल रही थी , पता नही ॥
उस दूध मुहे बच्चे की क्या खता थी ? समझ नही पाया !
नाव में जगह नही थी बाबा आ न सके ,
नाव चल पड़ी तो माँ फुट फुट कर रोने लगी ।
बाबा मन को दिलाशा दिलाते रहे , आबाद रहे तू ॥
दोनों बच्चों को संभालना मुस्किल पड़ रहा था ,
पर बेचारी मेमने को कैसे छोड़ दे ।
कल तक हमारे परिवार को पलती रही गैया को कैसे छोड़ दे
पर ले जाए तो कहाँ ?
छाती फट पड़ी , धीरे धीरे पानी की धारा उसे अपने साथ बहा ले गई
उसकी बेचैनी भी नही दिखी ॥ दिखी तो सिर्फ़ उसकी आँखे
जो शायद मेरी बेबसी को समझ गई ।
सेना सरकार और संस्था सभी ने कोशिश की और करते रहे ॥
सभी तरफ़ से मदद के हाँथ बढे पर नाकाफी साबित हुए ।
जन्माष्टमी आई कृष्ण भी जन्मे पर लोगों को इस विपत्ति से तार ना सके ।
तीज भी सुहागिनों का सुहाग बचा ना सकी ।
रोजा रखते और खुदा दे इबादत की पर कोसी तांडव मचाती रही ।
जिंदगी पटरी पर लाने की कोशिश जारी है ,
मतलबी अपना मतलब साधते रहे ।
राजनितिक पैंतरे आजमाने का सही समय तलाशते रहे ,
कुछ ने राजनितिक रोटी भी शेक ली , कुछ तयारी में लगे है ।
शियाशी पैंतरे समझने से ज्यादा जरूरी
जिंदगी का फलसफा समझने की थी ।
उम्मीद आज भी कायम है ।
घर बसाना है ...
मुनिया के हाँथ पीले करने है ....
छोटू को स्कूल भेजना है ....
ईद मनानी है ...
दिवाली मनानी है ....
एक आस जिसके बूते
जिंदगी अब भी जिंदा है .........
दीप नारायण दुबे

बुधवार, सितंबर 03, 2008

शोक क्यों कहलाती है कोसी


कभी हँसता खेलता
बच्चों के किलकारियो से गूंजता
मांगलिक गीतों के
गूंजने से पहले
सन्नाटा पसरा
जहाँ एक बूंद पानी को तरसती जिन्दगी
खेत सूखते बारिस के बिना
यह क्या सारा का सारा जलमग्न हो गया
इसमे गूंजती किलकारियां
हँसता खेलता कई परिवार घर से बेघर हो गया
वर्षो से संजोये जो सपने
वो आशियाँ पल मे उजड गया
कभी जो हाँथ फैलाये नही
उसे दूसरो के टुकड़े पर पलना पड़ा
भले खाने रहने का इंतजाम हो गया
कई हाँथ आगे बढे सहयोग के लिए
पर कोसी के कहर ने
हमारे संजोये ख्वाब को रोंद डाला
अब समझ आती है
की आख़िर क्यों बिहार की शोक कहलाती है कोसी ...........
सहयोग .... मुरली मनोहर श्रीवास्तव

इंतज़ार




किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है

जो प्यार देखा था तेरी आँखों मे

उसकी तलाश मे ये दिल आज भी है

गुजर गए मौसम

पर तेरे प्यार का साथ आज भी है

ये दिल जो धड़का था तेरे लिए

उसकी हर धड़कन तेरे नाम आज भी है

किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है ........

मंगलवार, सितंबर 02, 2008

मोची चच्चा

मोची चाचा ...
राम शशि एक आम आदमी , हसरत थी पढ़ने की कुछ करने की पर हैसियत ने उम्मीद का दामन छोड़ दिया /
भूख के सामने तमन्नाये उड़ान भर ना सकी / मट्रिक के बाद पेशे से जुड़ना पड़ा , आज वो एक मोची है / दूर जो वो दूकान थी वो राम शशि की है,अकसर वहां लोग अपने फटे पुराने जुटे -चप्पल की मरम्मत कराने के लिये रुकते है /थोड़ा करीब गया और करीब गया तो राम शशि की वो दूकान पाठशाला बनती दिखी , समझने को कुछ नही था ये तो राम शशि की वो धुंधली सी तस्वीर थी जिसमे वो रंग भरने की कोशीस कर रहा था /दिल की ये आरजू है की दूसरा राम शशि न बने /
छुटकी को गणित सिखाते है तो बीच बीच मे अलका को पहडा भी पढाते है / छोटू पीछे शरारत करता है तो एक बार निगरानी भी करते है मास्टर साहब जैसे तो लगते नही लगते पर ये उनकी पाठशाला है और राम शशि उनके मास्टर साहब है /इनसे इनको उम्मीद बस इतनी है की कल ये कुछ बनेंगे और जब भी इनसे मिलेंगे तो इन्हे आदर दे प्रणाम करेंगे /
कल तक सोनी फ़िर मोहन ,उसके बाद चंचल फ़िर रेखा , बच्चे आते गए सड़क के किनारे पढने पढाने का दौर शुरू हुआ /राम शशि मे पढाने की इक्छा शक्ति है ,लड़को मे पढने की ललक है /
बच्चो की लगातार बढ़ रहे तादाद सरकार को सोचने पर मजबूर करती है कि बच्चों को स्कूल चाहिए , पढ़ाई चाहिए ना कि खिचडी कि खुराक /


काया आपने कभी सोचा है ?..................